यमुना के लिए उठती उम्मीद की पदचाप : जल सहेली समिति का संकल्प और समाज की पुकार
15 February 2026, 13:44
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Religious
वृन्दावन | संजय सिंह
अविरल-निर्मल यमुना का सपना लिए जल सहेलियों की यात्रा अब वृन्दावन पहुंच चुकी है। यहां से आगे बढ़ते हुए यह कारवां दिल्ली की ओर अग्रसर है, लेकिन इस यात्रा का असली पड़ाव केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि समाज की चेतना है।
29 जनवरी को जनपद जालौन के पचनद धाम से प्रारंभ हुई यह यात्रा अब तक लगभग 250–300 किलोमीटर का सफर तय कर चुकी है। 17 जनसंवादों के दौरान जो सच्चाई सामने आई है, वह चिंताजनक है। यमुना की अविरलता और निर्मलता को लेकर समाज चिंतित तो है, पर निराशा बढ़ती जा रही है। लोग धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारी सरकार पर छोड़ते जा रहे हैं, जबकि नदियों की रक्षा में समाज की भूमिका उतनी ही अनिवार्य है।
आज नदी किनारे आरती, पूजन और धार्मिक आयोजन तो होते हैं, लेकिन नदी के स्वाभाविक प्रवाह, स्वच्छता और संरक्षण के व्यवहारिक दायित्वों से समाज दूर होता जा रहा है। यही वह खालीपन है, जिसे भरने के लिए जल सहेली समिति सड़क पर उतरी है। नारे नहीं, संवाद के साथ।
पदयात्रा के दौरान लोगों ने जल सहेलियों को चलते देखा, उनसे बात की और कहा कि समाज को जगाने के लिए ऐसे प्रयास समय की सबसे बड़ी जरूरत हैं। यही इस यात्रा का उद्देश्य भी है। जल सहेली समिति के संस्थापक संजय सिंह कहते हैं कि
नदियां हमारी साझा विरासत हैं। इन्हें केवल सरकार या समाज के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जब तक दोनों मिलकर जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे, सकारात्मक बदलाव संभव नहीं है। उनके लिए यमुना सिर्फ नदी नहीं, बल्कि संस्कृति और आस्था की धारा है, जो पचनद में नया जीवन पाकर प्रयागराज में संगम पर गंगा से मिलती है। लगभग 1250 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में बहने वाली यह नदी लाखों लोगों की अर्थव्यवस्था और जीवनरेखा है। जल सहेली समिति की राष्ट्रीय अध्यक्ष पुष्पा कुशवाहा का कहना है कि बुंदेलखंड का पूरा क्षेत्र यमुना बेसिन से जुड़ा है। हमारा यमुना से भावनात्मक रिश्ता है। इसी जुड़ाव के कारण हम बिना किसी स्वार्थ के घर-परिवार छोड़कर इस यात्रा में निकले हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों को जीवित यमुना मिल सके। जल सहेली समिति आज सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि उस उम्मीद का नाम है जो समाज को उसकी जिम्मेदारी याद दिला रही है। यह यात्रा बता रही है कि अगर समाज जागे, तो यमुना बचेगी और अगर यमुना बचेगी, तो हमारी संस्कृति, आस्था और भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।