वृन्दावन के गौरा नगर निवासी और वरिष्ठ पत्रकार लाखन सिंह का नाम नई वोटर लिस्ट में दर्ज न होने से स्थानीय स्तर पर सवाल खड़े हो गए हैं। लाखन सिंह का कहना है कि उनके दोनों बड़े भाइयों महेंद्र सिंह उर्फ कल्लू और बादाम सिंह के नाम नई मतदाता सूची में शामिल कर लिए गए हैं, लेकिन उनका नाम अब भी गायब है, जबकि उनका परिवार वृन्दावन में कई दशकों से निवास करता आ रहा है।
लाखन सिंह ने बताया कि उनकी माता लक्ष्मी देवी नगर पालिका परिषद वृन्दावन में दो पंचवर्षीय कार्यकाल तक सभासद रह चुकी हैं, वहीं उनके भाई बादाम सिंह भी एक पंचवर्षीय कार्यकाल में सभासद रहे हैं। इसके बावजूद लाखन सिंह को मतदाता सूची से बाहर रखा जाना समझ से परे है।
उनका कहना है कि वर्ष 2003 में वह नाबालिग थे, इसी कारण उस समय की वोटर लिस्ट में उनका नाम दर्ज नहीं हो पाया था। लेकिन हाल ही में चली SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया के दौरान उन्होंने नियमानुसार फॉर्म भरा और उसके साथ BLO मुकेश सैनी को अपनी हाईस्कूल की मार्कशीट तथा माता-पिता की 2003 की वोटर लिस्ट को प्रमाण के रूप में संलग्न किया। इसके बावजूद नई वोटर लिस्ट में उनका नाम शामिल नहीं किया गया।
यह मामला सीधे तौर पर SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। जब एक ऐसे व्यक्ति का नाम, जिसने सभी जरूरी दस्तावेज जमा किए हों और जिसका पारिवारिक व स्थानीय रिकॉर्ड निर्विवाद हो, मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पा रहा है, तो आम नागरिकों के साथ क्या स्थिति हो रही होगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि SIR प्रक्रिया में लापरवाही या दस्तावेजों की सही तरीके से जांच न होना लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। मताधिकार जैसे मौलिक अधिकार से किसी पात्र नागरिक को वंचित किया जाना गंभीर विषय है, जिसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
अब सवाल यह है कि लाखन सिंह का नाम नई वोटर लिस्ट में न आने की चूक आखिर किस स्तर पर हुई। फॉर्म स्वीकार करने वाले कर्मचारियों की, सत्यापन प्रक्रिया की या फिर पूरी SIR व्यवस्था की? चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को इस मामले का संज्ञान लेकर न सिर्फ समाधान करना चाहिए, बल्कि SIR प्रक्रिया में मौजूद खामियों को भी दूर करना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी अन्य नागरिक को इस तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।