'ऐसे वर को क्या वरूँ जो जन्मे और मर जाए'— बाँके बिहारी संग पहली वर्षगांठ पर भावुक हुई इंदुलेखा
15 February 2026, 18:04
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Religious
वृन्दावन | विकास अग्रवाल
वृन्दावन में आज भावनाओं, भक्ति और विश्वास से भरा एक अनोखा दृश्य देखने को मिला, जब इंदुलेखा ने ठाकुर बाँके बिहारी के साथ अपनी विवाह की पहली वर्षगांठ मनाई। यह कोई सामान्य वर्षगांठ नहीं थी, बल्कि एक ऐसी कथा थी, जिसने सुनने और पढ़ने वालों की आँखें नम कर दीं।
इंदुलेखा ने विगत वर्ष 15 फरवरी को संसार की रूढ़ मान्यताओं को तोड़ते हुए ठाकुर बाँके बिहारी को अपने पति रूप में स्वीकार किया था। इससे पहले उनका एक सांसारिक विवाह हुआ था, जिसे वे आज भी जलालत और उपेक्षा से भरा बताती हैं। उनका कहना है कि उस रिश्ते में न उन्हें सम्मान मिला, न अपनापन।
इसी पीड़ा से निकलकर उन्होंने उस प्रेम को चुना, जो नश्वर नहीं, बल्कि शाश्वत है। इंदुलेखा ने मीराबाई का उदाहरण देते हुए कहा कि
“ऐसे वर को क्या वरूँ, जो जन्मे और मर जाए।
मैंने ऐसो वर चुनो, मेरो जन्म अमर कहाये।”
उनका मानना है कि बाँके बिहारी केवल उनके पति नहीं, बल्कि पूरे संसार के पति हैं। सबके प्राणों के स्वामी, एक अगोचर शक्ति। इंदुलेखा कहती हैं कि जो लोग इस रिश्ते को नाटक या ढोंग समझते हैं, वे प्रेम की गहराई नहीं समझ सकते। वे भावुक स्वर में कहती हैं कि “जा तन लागी, वही जाने।" प्रभु से प्रेम वही समझ सकता है, जिसके भीतर भक्ति जाग चुकी हो।” इंदुलेखा का यह भी कहना है कि जब से उन्हें संसार पति मिले हैं, उन्हें जीवन में किसी अभाव का अनुभव नहीं हुआ। घर का किराया हो या दैनिक आवश्यकताएँ। उनका विश्वास है कि सब कुछ बिहारी जी स्वयं सँभालते हैं। वे कहती हैं कि
जहाँ पहले कोई कद्र नहीं थी, वहाँ अब सब कुछ मिल गया। इस वर्षगांठ को और भी विशेष बनाता है आज का दिन महाशिवरात्रि। इंदुलेखा पहले भगवान शिव की भक्त थीं और उन्हें पिता के रूप में मानती हैं। उनका विश्वास है कि शिव ने ही उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें बाँके बिहारी को पति रूप में प्रदान किया है। जिस प्रकार शिव और माता पार्वती का मिलन महाशिवरात्रि को हुआ था, उसी पावन तिथि पर उनकी यह पहली विवाह गांठ मनाई जा रही है।
इस भावुक अवसर पर इंदुलेखा ने अपना एक भजन भी लॉन्च किया, जिसमें उनका प्रेम शब्दों और स्वर के माध्यम से बह निकला। “ओ मुझे हो गया कन्हैया से प्यार, मैं तो वृन्दावन जाऊँगी।वृन्दावन में हैं बाँके बिहारी, लागे उनकी सूरत प्यारी, मैं तो देख-देख करूँ प्यार…”
यह भजन केवल संगीत नहीं, बल्कि इंदुलेखा की आत्मा की पुकार है। एक ऐसी स्त्री की कथा, जिसने संसार की ठोकरों से सीखकर ईश्वर को अपना सर्वस्व मान लिया। वृन्दावन की गलियों में आज यह कहानी चर्चा का विषय है। कोई इसे आस्था कह रहा है, कोई अंधविश्वास। लेकिन इंदुलेखा के चेहरे पर संतोष और आँखों में प्रेम साफ़ कहता है कि उनके लिए यह कोई समाचार नहीं, बल्कि उनका सच है।